अंजुमन इस्लाम बैतुलमाल आपका ख़ैर मक़दम करता है
1947 मे जब मुल्क के हालात निहायत नासाज़गार थे और सोने की चिड़िया कहलाने वाला हमारा वतनِ अज़ीज़ इंतिशार, फिरकावारियत, ग़ुरबत, इफ़्लास और बे-रोज़गारी की गिरिफ़्त में आ चुका था। हर सिम्त मायूसी और बे-इतमिनानी की फ़िज़ा छाई हुई थी। ऐसे दुश्वार दौर में इस इलाके के कुछ ज़िंदा-दिल, रोशन-ज़मीर और साहिब-ए-नज़र हज़रात ने क़ौम व मिल्लत की खस्ता हालत को महसूस किया और बेचैन हो उठे। उन्हें इस बात की फ़िक्र लाहिक़ हुई कि कोई ऐसा इदारा क़ायम किया जाए जो बग़ैर किसी तफ़रीक़ और इम्तियाज़ के जरूरतमंद अफ़राद की इमदाद, हमदर्दी और ग़म-गुसारी का फ़रीज़ा अंजाम दे सके, ताकि नबी करीम ﷺ के इरशाद “अल-मुस्लिम अखुल-मुस्लिम” की अमली ताबीर मुमकिन हो सके। इसी नेक मक़सद के तहत कुछ दर्दमंद हज़रात पर मुश्तमिल एक वफ़द हैदराबाद गया, जहाँ मुख़्तलिफ़ तंज़ीमों की कारकर्दगी का जायज़ा लिया गया। वापसी के बाद अपने इलाके में इस कार-ए-ख़ैर की बुनियाद रखी गई। इब्तिदा में कुछ मुश्किलात पेश आईं, मगर अल्लाह तआला के फ़ज़्ल से अवाम-उन्नास का भरपूर तआवुन हासिल हुआ। 1955ء में इस इदारे को बाक़ायदा तौर पर रजिस्टर किया गया।